Wed. Feb 4th, 2026
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जनतानामा न्यूज अल्मोड़ा उत्तराखण्ड़

मंत्री के आदेश थे “सभी फर्मों की जांच”, पर परखी गई सिर्फ एक — बाकी दो को कैसे मिली क्लीन चिट?


देहरादून/अल्मोड़ा प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के तहत प्रदेश में बनाए गए जियो लाइन टैंकों की गुणवत्ता को लेकर अब बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। कृषि मंत्री कार्यालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद जांच प्रक्रिया में कथित चयनात्मक रवैया अपनाए जाने का मामला सामने आया है।


कृषि मंत्री कार्यालय द्वारा पत्रांक 3287, दिनांक 21 नवम्बर 2025 को जारी आदेश में साफ कहा गया था कि प्रदेश के सभी जिलों में निर्मित जियो लाइन टैंकों की गुणवत्ता की जांच कर दोषी फर्मों पर तत्काल कार्रवाई की जाए। यह निर्देश तब जारी हुआ था जब मंत्री के निरीक्षण के दौरान चमोली, रुद्रप्रयाग और पौड़ी जिलों में टैंकों की गुणवत्ता पर सवाल उठे थे।
लेकिन इसके ठीक तीन दिन बाद, 24 नवम्बर 2025 को कृषि निदेशालय द्वारा जारी पत्र में बताया गया कि उस समय तीन अधिकृत फर्में कार्यरत थीं—
Saaransh Agro Solution, देहरादून
Shalimar Enviro Pvt. Ltd., दिल्ली
Varun Fertilizers Pvt. Ltd., देहरादून
अब RTI के जरिए सामने आए दस्तावेजों ने पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया है। दस्तावेजों के अनुसार केवल Varun Fertilizers Pvt. Ltd. द्वारा निर्मित टैंकों की ही गुणवत्ता जांच कराई गई, जबकि शेष दो फर्मों को बिना किसी भौतिक परीक्षण के ही संतोषजनक मान लिया गया।
यही वह बिंदु है जहां से सवालों की झड़ी शुरू होती है—
▪ जब मंत्री कार्यालय के निर्देश “सभी फर्मों और सभी जिलों” के लिए थे, तो जांच सीमित क्यों कर दी गई?
▪ दो फर्मों को गुणवत्ता परीक्षण से बाहर किस आधार पर रखा गया?
▪ क्या जांच प्रक्रिया में जानबूझकर चयनात्मकता बरती गई?
यह खुलासा पूर्व कृषि अधिकारी, RTI कार्यकर्ता एवं समाजसेवी चंद्र शेखर जोशी (भीमताल) द्वारा सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर सामने आया है।
RTI रिकॉर्ड यह भी संकेत देते हैं कि यदि गुणवत्ता मानकों पर टैंक खरे न उतरें, तो संबंधित फर्मों को ब्लैकलिस्ट करने और पंजीकरण निरस्त करने तक की कार्रवाई के निर्देश थे। ऐसे में आंशिक जांच और दो फर्मों को बिना परीक्षण ‘क्लीन चिट’ दिए जाने से विभाग की मंशा पर सवाल उठना लाज़मी है।
अब यह मामला सिर्फ विभागीय प्रक्रिया का नहीं, बल्कि किसानों के हित और सरकारी धन की पारदर्शिता से जुड़ गया है।
उठ रहे बड़े सवाल
► क्या कृषि मंत्री कार्यालय को पूरी और वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट दी गई?
► क्या जांच प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी थी?
► क्या इस मामले में वित्तीय अनियमितता की आशंका से इंकार किया जा सकता है?
► क्या अब इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और व्यापक जांच जरूरी नहीं हो गई है?
यदि किसानों के लिए बनाई गई योजना में गुणवत्ता से समझौता हुआ है, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि जनहित के साथ गंभीर खिलवाड़ माना जाएगा।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या सरकार इस मामले में स्वतंत्र तकनीकी जांच कराएगी या फिर यह फाइल भी बाकी विवादों की तरह दबकर रह जाएगी।