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दशानन कृत ज्योतिष के आज के अंक में वृष लग्न में राहु के द्वादश भावों के शुभ अशुभ फल

०९/जून /२०२४ • JUN 9, 2024


विक्रम संवत २०८१, शक संवत १९४६

यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।

तद्वद्वेदांगशास्त्राणां ज्योतिषं मूर्धनि स्थितम् ॥

वृष लग्न का राहु आपके जीवन मे क्या प्रभाव डाल सकता है जानिए

वृष लग्न में राहु की बारह स्थितियों का अलग-अलग प्रभाव होता है

जनतानामा न्यूज़ भुवन जोशी अल्मोड़ा उत्तराखण्ड

ज्योतिषचार्य कौशल जोशी (शास्त्री) प्राचीन “कुमायूँ की काशी” माला सोमेश्वर

राहु प्रथम भाव में – वृष लग्न के पहले भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राह के प्रभाव से जातक के स्वास्थ्य में कमी आती है। उसकी सुन्दरता बिगड आती है तथा चेहरा भयानक होने लगता है। लेकिन चतुर होने से वह अपना काम निकालने में सफल होता है।

सिर के अवयवों में कमी, चिन्ता, भारी क्रोध के कारण नुकसान। भाइयों से झगड़ा, सिर पर आघात, पराक्रमी, उन्नति के पथ पर अग्रसर । अनाधिकार प्रयत्न, डाकुओं का साथी।

ऐसा जातक बड़ा ही हिम्मती तथा साहसी होता है जिससे उसका व्यक्तित्व उच्चतर होता जाता है। लेकिन कुछ ग्रह योग से उसे शारीरिक कष्ट होने का भय बना रहता है। धन अनावश्यक रूप से खर्च होता है।

राहु द्वितीय भाव में-वृष लग्न के दूसरे भाव  में स्थित राहु के प्रभाव से जातक बड़ा ही होनहार एवं मिलनसार होता है। विवेक तथा चतुराई से वह अपने कार्य आसानी से निपटा लेता है। कई युक्तियों द्वारा वह अच्छा धन कमाता है।

पिता की सम्पत्ति का सत्यानाश। कर्ज, अनाधिकार प्रयत्न। जेब कट, भाइयों को पिता की शेष सम्पत्ति मिले, अशान्ति। संकटों का सामना। चिन्तायुक्त ।

ऐसे जातक के पारिवारिक सम्बंधों में प्रगाढ़ता बनी रहती है। कुछ ग्रह योग विपरीत होने से उसे कई कष्ट उठाने पड़ते हैं। इन कष्टों के कारण उसे काफी झुकना पड़ जाता है, लेकिन स्वयं के विश्वास तथा संयम भाव रखने से वह अपने उद्देश्यों में सफल हो जाता है।



राहु तृतीय भाव में -वृष लग्न में राहु के तीसरे भाव  में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित होने से जातक को भाई-बहनों द्वारा कोई सुख-सहयोग नहीं मिलता। उसके पराक्रम में भी कमी होती है। स्वस्थ होने के बावजूद वह कमजोरी एवं कष्ट महसूस करता है।

भारी पुरुषार्थ। गुप्त युक्तियों से कार्य, कठिन कार्यों को पूरो करे, दूसरों को दबाव में रखे, प्रभावशाली, अपनी स्वार्थ- सिद्धि के लिए कभी न चूकने वाला, साहसी, हथियार साथ रखे, भाग्योदय चार बार।

ऐसे ग्रह योग वाले जातक को कई बार अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए झूठ का सहारा लेना पड़ता है, चिन्ताओं एवं कष्टों को दबाना पड़ता है तथा हर इन्सान के सामने खुश रहना पड़ता है।


राहु चतुर्थ भाव में – वृष लग्न में राहु के चौथे भाव  में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित होने के कारण जातक कई कष्टों से ग्रस्त हो जाता है। माता का पूर्ण सहयोग नहीं मिलता। जमीन जायदाद आदि का सुख भी दूर रहता है।

माता की उम्र कम, सुख की कमी, सवारी चोरी चली जाए, मकान छिन जाए, यदि चन्द्रमा कृष्णपक्ष का हो तो जमीन जायदाद से दूसरों को चमत्कृत कर देने वाला, भाई माता के खिलाफ।

कुछ ग्रह योग ऐसे बनते हैं कि जातक को अपरिचित व्यक्तियों के साथ अनजान स्थान पर रहना पड़ता है। वहां पर वह कई कष्टों का सामना करता है। लेकिन धैर्य तथा कठिन परिश्रम द्वारा वह अपने सभी कष्टों से मुक्त हो जाता है।

राहु पंचम भाव में -वृष लग्न के पांचवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को कई आत्मिक कष्ट उठाने पड़ते हैं। लेकिन इन कष्टों के बाद उसे कुछ सन्तान सुख भी मिलता है।

शिक्षा में कमी, बुद्धि में कमी, एक पुत्र मूर्ख, सन्तान से सुख न मिले। हकला। अपने विचार उत्तमता से प्रकट न कर सके।

मन-मस्तिष्क में उलझनें रहने के कारण ऐसा जातक अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाता। वह वाचाल होता है। चंचलता उसकी आदत होती है। इसी कारण वह आवारा एवं बदमाश किस्म का हो जाता है।

राहु षष्ठम भाव में – वृष लग्न के छठवें भाव में स्थित राहु के प्रभाव से जातक को किसी प्रकार की कोई हानि नहीं होती। वह अपने साहस तथा बाहुबल से शत्रु पक्ष का मुकाबला करके भारी विजय प्राप्त करता है।

पराक्रमी, विजयी, शत्रु संहारक, निरोगी, चतुर, कूटनीति से कार्य। सावधान। नई-नई युक्तियाँ सोचने वाला ननसाल में दिक्कतें, मामा दुखी।

ऐसे जातक को अपनी माता की ओर से कोई सुख नहीं मिलता। मामा का भी पक्ष कमजोर बना रहता है। वह बहुत ही कुशाग्र बुद्धि का होता है तथा कूटनीतिक चालों से अपना कार्य सिद्ध करता है।

राहु सप्तम भाव में -वृष लग्न के सातवें भाव  में अपने शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को कई प्रकार के कष्ट उठाने पड़ते हैं। विशेष रूप से उसे स्त्री पक्ष द्वारा अधिक कष्ट मिलता है। नौकरी तथा व्यापार आदि में कठिनाइयां आती रहती हैं।

विवाह देर में हो, पत्नी से न बने, कुछ अलग- अलग रहें। पत्नी को मारे। रोजगार में परेशानियाँ, रोजी में कमी, अनाधिकार लाभ उठाने वाला, चालाक ।

लेकिन ऐसा जातक इनसे हताश एवं निराश नहीं होता। वह अपनी समझबूज तथा पराक्रम से इन कठिनाइयों पर काबू पा लेता है। ग्रह स्थितिवश कुछ विपगेन प्रभाव पड़ने से उसके शरीर में असामान्य विकार उत्पन्न होते हैं जिससे वह चिन्तित रहने लगता है।

राहु अष्टम भाव में -वृष लग्न के आठवें भाव  में स्थित राहु के प्रभाव से जातक हमेशा किसी न किसी समस्या से घिरा रहता है। कुछ लोगों को अपने प्राचीन धरोहरों से नुकसान उठाना पड़ता है तो कुछ को आयु सम्बंधी कष्ट होता है। लेकिन इन कष्टों के बाद भी वह संयम से काम लेता है।

सर्प व सीढ़ी का भय, बन्धु-बान्धव दुखी, उम्र कम, पेट के निचले भाग में रोग, सन्तान को कष्ट।

ऐसा जातक अपनी चिन्ताओं तथा दुःखों को बिल्कुल प्रकट नहीं होने देता। सामान्य भाव में रहने के कारण वह नए-नए गुप्त तरीके अपनाकर आराम से जीवन व्यतीत करता है। लेकिन उसे अल्प धन से ही सन्तोष करना पड़ता है।


राहु नवम भाव में – वृष लग्न के नौवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक का भाग्य कमजोर पड़ जाता है। धर्म-कर्म में उसकी कोई विशेष रुचि नहीं रहती। अपना जीवन सफल बनाने के लिए उसे साहस, धैर्य तथा गोपनीय तरीकों का सहारा लेना पड़ता है।

भाग्य में बाधा, धन का नुकसान, यात्रा में नुकसान अपने धर्म में विश्वास न रखे, ईश्वर की सहायता में कमी, अपयशी, शत्रु डगमगा जाए।

ऐसे जातक को कठोर से कठोर परिश्रम वाले कार्य करने पड़ते हैं। उसका जीवन सामान्यतः गरीबी में ही व्यतीत होता है। वह कभी गरीब तथा कभी अमीर बनता है। लेकिन यह स्थिति निरन्तर नहीं बनी रहती।

राहु दशम भाव में -वृष लग्न के दसवें भाव  में स्थित राहु के प्रभाव से जातक को अपने पिता के कारण घोर संकट का सामना करना पड़ता है। नौकरी तथा व्यापार में भी कठिनाइयां बनी रहती हैं। पत्नी तथा पुत्र सुख कम ही मिलता है।

पिता दुखी, स्त्री दुखी, माता दुखी, सर्विस में परिश्रम करना पड़े। पेचीदा तरकीबों से सुख पावे। नाव में डूबना।

ऐसे जातक को इन सबसे जूझने में संयम से काम लेना चाहिए। अपने कार्य क्षेत्र में हिम्मत करके डटे रहने से अच्छी सफलता मिलती है। गोपनीय तरीके अपनाने तथा कठिन परिश्रम करने से उसकी दशा सुधरने लगती है और वह एक प्रतिष्ठित व्यक्ति बन जाता है।

राहु एकादश भाव में -वृष लग्न में राहु के ग्यारहवें भाव में स्थित होने से जातक को कई उलझनों के बावजूद अपार सफलता मिलती है। आय क्षेत्र से पूर्ण धन प्राप्त होता है। आर्थिक दशा सुधर जाती है। वह गोपनीय चालों एवं युक्तियों द्वारा अच्छा धन कमाने लगता है।

लोहे के निर्माण से लाभ ही लाभ, कभी-कभी नुकसान, एक भाई से सांझा, गुप्त युक्तियों से कार्य कुशल, व्यवहार में रूखा परन्तु चतुर, सब संकटों को पार करने वाला, अगले जन्म में कोयले का कार्य करेगा तथा जीवन में सुख पाएगा।

ऐसे जातक पर कई बार अचानक कुछ कष्ट भी आते हैं, जिनका वह शान्त एवं संयम भाव से मुकाबला करता है। धैर्यशील होने से उसकी पहले जैसी स्थिति बरकरार रहती है। समाज में सब उसकी प्रशंसा करते हैं, लेकिन उसमें घमण्ड आना शुरू हो जाता है।

राहु द्वादश भाव में – वृष लग्न के बारहवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को अपना कारोबार चलाने तथा घरेलू खर्च पूरा करने में आंशिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इनसे बचने के लिए वह अच्छे तरीके से अपना कार्य करता है।

एक भ्राता की हानि, भाग्य में हानि खर्च बहुत, हताश न होने वाला, यात्रा में नुकसान, प्रधान का अनुगामी, पिछले जन्म में वकील तथा अपराधियों की तरफदारी करता था, इसलिए इस जन्म में मुकद्दमों में विशेष खर्च हो रहा है, धन की कमी।

ऐसा जातक संयम तथा सहज भाव से अपने सारे कष्टों पर विजय प्राप्त कर लेता है। इसके लिए उसे कुछ कूटनीतिक तरीके अपनाने पड़ते हैं तथा बाध्य दिखावा भी करना पड़ सकता है.

पूर्व में प्रसारित सप्ताहिक अंकों में आपने पढ़ा मेष लग्न में नवों ग्रहों के प्रत्येक लग्न के द्वादश भावों में मिलने वाले फल के बारे में

दशासन कृत ज्योतिष  में आजकल प्रसारित अंकों में  वृष लग्न में  नवों ग्रहों के द्वादश भावों पर पढ़ने वाले प्रभावों की जानकारी

साप्ताहिक समाचार दशानन कृत ज्योतिष में वृष लग्न के जातक पहले से द्वादश भाव मे केतु का फल जानने को पढ़े अगले रविवार का दशानन कृत ज्योतिष का साप्ताहिक अंक

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