दशानन कृत ज्योतिष के आज के अंक में वृष लग्न में शनि के द्वादश भावों के शुभ अशुभ फल
02/जून /२०२४ • JUN 02, 2024

विक्रम संवत २०८१, शक संवत १९४६
यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।
तद्वद्वेदांगशास्त्राणां ज्योतिषं मूर्धनि स्थितम् ॥
वृष लग्न का शनि आपके जीवन मे क्या प्रभाव डाल सकता है जानिए
वृष लग्न में शनि की बारह स्थितियों का अलग-अलग प्रभाव होता है
जनतानामा न्यूज़ भुवन जोशी अल्मोड़ा उत्तराखण्ड
ज्योतिषचार्य कौशल जोशी (शास्त्री) प्राचीन “कुमायूँ की काशी” माला सोमेश्वर

शनि प्रथम भाव में– वृष लग्न के पहले भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित शनि के फलादेश से जातक बहुत भाग्यशाली बनता है। वह खूबसूरत शरीर वाला होता है। मगर भाई-बहनों के सुख में कमी होती है।
पिता कृशगात, खर्च अधिक, भाग्य साथ नहीं देगा, अधिक परिश्रम करने पर भी फल प्राप्त में देर लगेगी तथा फल कुछ कम मिलेगा। लघु कर्म, नौकरी छूट जाएगी, धन का नुकसान, शत्रुओं पर विजय, रोगों से मुक्त, शराबी अफीमची, क्षेत्र में प्रधान, चिन्तित, पिछले जन्म में ईश्वर की आराधना नहीं की इस कारण भाग्य साथ नहीं देता, बाई आँख तथा कन्धे पर तिल।
शनि की सातवीं दृष्टि से जातक को शत्रुओं द्वारा हानि का योग बनता है। वह बहुत तेज बुद्धि का, कठिन परिश्रम करने वाला तथा धनी होता है। लेकिन कुछ ग्रह योग से उसे शत्रु पक्ष से भय बना रहता है।
शनि द्वितीय भाव में- वृष लग्न के दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक का परिवार बहुत बड़ा होता है। इस वजह से उसके भौतिक सुखों में कमी आती है। मुख्य रूप से उसे माता द्वारा पूरा सहयोग नहीं मिलता।
तमोगुणी, आलसी, भाग्यवान, अधिक यात्राएँ। दैवशक्ति प्रधान, तमोगुण, देवता प्रसन्न, सर्विस स्थायी, सर्विस में कई बार उन्नति, पिता कहता है पहलवानी करो, पत्नी क्रोधी, राज्य से लाभ, नाम की मुहर बने, चेहरे पर तिल।
शनि की सातवीं शत्रु दृष्टि के प्रभाव से जातक की आमदनी के अच्छे अवसर पैदा होते हैं। उसकी आयु में वृद्धि होती है। उसे समाज में उच्च सम्मान मिलता है। वह एक धनी व्यक्ति बन जाता है।
शनि तृतीय भाव में– वृष लग्न के तीसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक भाई-बहनों के प्यार से वंचित होता है या उनसे कलह-क्लेश बना रहता है। मगर उसके पुरुषार्थ में वृद्धि होती है। सन्तान पक्ष को लाभ का योग बनता है।
अलमारी की चाबियों पिता के पास हैं। पिता का धन पूरा लिखा है, रिश्वत देकर नौकरी लिखी है, माता को कष्ट, उम्र कम, मकान त्यागना पड़े, भाग्यवान्, धनवान, दूर की यात्राओं में भाग्योदय, दाएँ कान, आँख व कंधे पर तिल, इष्टदेव के दर्शन ।
शनि की सातवीं दृष्टि के प्रभाव से जातक के भाग्य में वृद्धि होती है। उसका खर्च बहुत कम होता है। अपने काम में कुछ लापरवाह होने से उसे कई प्रकार की हानियां होने लगती हैं।
शनि चतुर्थ भाव में-वृष लग्न के चौथे भाव- में शनि के स्थित होने से जातक हमेशा सामान्य जीवन जीता है। अपनी माता के साथ उसका मनमुटाव बना रहता है। भूमि एवं मकान आदि का भी अभाव होता है। केवल मामा द्वारा ही उसे कुछ राहत मिलती है।
पराक्रमी, पराक्रम से उन्नति, बहन-भाई सब भाग्यवानु, पिता अन्य सन्तान को अधिक चाहे। पूर्ण भाग्यवान, दैव-शक्ति की सहायता। भाइयों को भी नौकरी मिल गई। चिन्तित, दाहिनी भुजा पर विल।
शनि की सातवीं दृष्टि से पिता द्वारा कुछ लाभ प्राप्त होता है। व्यवसाय एवं बैंकरी आदि में प्रगति होती है। दसवीं मित्र दृष्टि होने से शरीर स्वस्थ तथा सुन्दर बनता है। उसे उच्च स्तरीय सम्मान प्राप्त होता है।
शनि पंचम भाव में-वृष लग्न के पांचवें भाव में स्थित शनि के प्रभाव से जातक को सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र में काफी सफलता मिलती है। तीसरी शत्रु दृष्टि होने से पत्नी द्वारा घर एवं व्यवसाय में असन्तोष-सा बना रहता है।
पिता कहता है कि जमीन मत खरीदो, सर्विस, अफसर नाराज तथा बीमार, शत्रुओं पर प्रभाव, देह कृश, भाग्य की आशा कम, परिश्रम का फल मिले, माता रुग्ण, पेट पर जिगर की तरफ तिल।
शनि की सातवीं दृष्टि के प्रभाव से जातक के आय के साधनों में रुकावटें आती हैं जिससे उसकी दिनचर्या प्रभावित होती है। दसवीं मित्र दृष्टि होने से धन लाभ का योग बनता है। परिवार मजबूत स्थिति में आ जाता है। ऐसी कुण्डली वाले व्यक्ति की मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है।
शनि षष्ठम भाव में- वृष लग्न के छठवें भाव में स्थित शनि के प्रभाव से जातक अपने प्रबल शत्रु को आसानी से हरा देता है। उसे नौकरी में पदोन्नति मिलती है, आयु बढ़ती है तथा कुछ प्राचीन वस्तुओं का लाभ प्राप्त होता है।
कन्या सन्नति, सन्तान भाग्यवान, सन्तान को सर्विस मिल जाए, अंग्रेजी भाषा का विशेषज्ञ। पत्नी दुखी, तत्त्वज्ञानी, वैद्य, व्यापार तथा सर्विस दोनों, धन की विशेष प्राप्ति। उच्चपद की लालसा, दाहिनी जाँघ पर तिल।
शनि की सातवीं नीच दृष्टि होने से बाहरी साधनों तथा व्यक्तियों द्वारा जातक का असन्तोषजनक सम्बंध बना रहता है। कुछ ग्रह स्थिति विपरीत होने के कारण भाई-बहनों में लड़ाई-झगड़ा चलता रहता है, फिर भी जीवन सामान्य रहता है।
शनि सप्तम भाव में– वृष लग्न के सातवें भाव में स्थित शनि के प्रभाव से जातक अपने व्यवसाय तथा नौकरी में अच्छी सफलता हासिल करता है। लेकिन कुछ घरेलू झंझटों में वह घिरा रहता है। पिता और राज्य द्वारा उसे सहायता मिलती है। धर्म-कर्म में उसका विश्वास बढ़ता है।
पहलवान, शत्रु संहारक, निरोग काया। भाग्य में वृद्धि, पिता की दीर्घ आयु परन्तु कुछ झंझट, खर्च मामूली, पहलवानी के कारण नौकरी में काम कम करे पर अफसर का पिट्टू रहे, दाहिनी टाँग पर कई तिल। मकान में उत्तर पश्चिम में धन गढ़ा है।
शनि की सातवीं मित्र दृष्टि होने से जातक की शारीरिक सुन्दरता में वृद्धि होती है। सभी लोग उससे प्यार करने लगते हैं। दसवीं शत्रु दृष्टि के प्रभाव से उसे जमीन- जायदाद में कुछ हानि या कमी महसूस होती है।
शनि अष्टम भाव में –वृष लग्न के आठवें भाव में अपने शत्रु बृहस्पति की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। रोगी होने पर वह स्वस्थ हो जाता है। उसकी आयु में वृद्धि होती है। मगर उसे अपना भाग्य बनाने के लिए कठिन से कठिन संघर्ष करना पड़ता है।
पत्नी भाग्यवान् है, पिता पुत्रवधू को बहुत चाहता है। स्वयं चिन्तित, दैनिक रोजी, उत्तम पत्नी, आलसी तथा स्थूल, माता को कष्ट। मानयुक्त, भाग्यवान् पत्नी जो भाग्यवृद्धि के स्वप्न देखती है तथा वे स्वप्न सत्य होते हैं, इन्द्रिय पर तिल।
शनि की सातवीं मित्र दृष्टि के कारण ऐसा जातक धन कमाने के लिए अधिक परिश्रम करता है। उसे संतान तथा आयु का लाभ प्राप्त होता है। कई प्राचीन वस्तुओं की प्राप्ति का भी योग बनता है।
शनि नवम भाव में – वृष लग्न के नौवें भाव में स्वराशि स्थित शनि के कारण जातक पिता द्वारा काफी लाभ प्राप्त करता है। वह धार्मिक किस्म का बन जाता है। ग्रह स्थितिवश वह गलत तरीके से पैसे कमाना शुरू कर देता है।
बहुत दीर्घ उम्र, नौकरी छूट जाएगी। भाग्य साथ नहीं देगा, पिता को संकट। कुछ पिता का धन मिल जाएगा। विदेश में लाभ। विद्या में कमी, धर्म बदलने में तत्पर, बाएँ पैर पर तिल।
शनि की सातवीं शत्रु दृष्टि से जातक के पुरुषार्थ में वृद्धि होती है, लेकिन भाई-बहनों से लड़ाई-झगड़ा चलता रहता है। दसवीं उच्च दृष्टि होने से वह अपने अधिकार क्षेत्र का सही उपयोग करके शत्रु पक्ष पर विजय हासिल कर लेता है। इससे उसका प्रभाव पूरे क्षेत्र में बढ़ जाता है।
शनि दशम भाव में – वृष लग्न में शनि के दसवें भाव में स्थित होने के फलादेश से जातक को पिता से पूर्ण सहयोग मिलता है। वह पिता द्वारा कमाए हुए धन तथा जमीन-जायदाद का स्वामी बन जाता है। मगर बाहरी सम्बंधों में कुछ कड़वाहट आनी शुरू हो जाती है।
महाभाग्यशाली, राजघराने में उत्पन्न, तमोगुणी, देवता प्रसन्न, लक्ष्मी प्रसन्न, पराक्रमी राजयोग। पिता कहता है कि भजन कर, पिता भी भाग्यवान, धनवान, भाई-बहन का सुख, बाई जाँघ पर तिल । मकान के दक्षिण में आँगन की तरफ धन गढ़ा है, भाग्योदय दो बार।
शनि की सातवीं शत्रु दृष्टि होने से जातक का स्त्री पक्ष काफी भाग्यशाली होता है। फिर भी उसके जीवन में कुछ कठिनाइयां अवश्य होती हैं। इन कठिनाइयों में भी वह आसानी से जीवन-यापन करता है।
शनि एकादश भाव में – वृष लग्न के ग्यारहवें भाव में शत्रु बृहस्पति की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक को अपने व्यवसाय में कठिन परिश्रम करना पड़ता है, तभी उसे कुछ सफलता मिलती है। वैसे भाग्य हमेशा उसका साथ देता है। स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ उसे आयु लाभ भी प्राप्त होता है।
पिता पहलवान तथा भयानक, स्थाई सर्विस। पिता अपनी पत्नी को सताता है, राज में विजय। राजयोग, पुलिस या फौज में अधिकारी। सुख में कमी, पत्नी से मनमुटाव, हृदय पर तिल ।
शनि की सातवीं मित्र दृष्टि से जातक को सन्तान पक्ष में सफलता मिलती है। उसकी शिक्षा अच्छी होती है। वह कुशाग्र बुद्धि का होता है। लेकिन कुछ ग्रह योग के कारण उसे पुरानी वस्तुओं का लाभ नहीं मिलता।
शनि द्वादश भाव में – वृष लग्न के बारहवें भाव में नीच राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक को कई चीजों का अभाव रहता है। उसके पास पर्याप्त धन नहीं होता। राज्य, व्यवसाय एवं धर्म आदि के क्षेत्र में कमियां बनी रहती हैं। धन का पूर्ण लाभ न होने से उसका परिवार दुःखी रहता है।
पिता कहता है कि नौकरी कर, कर्मशील तथा भाग्यवान्, दैव की असीम सहायता, अंग्रेजी में चतुर, सन्तान आलसी तथा वाक्चतुर, परिश्रमी, कृश, अगले जन्म में भी पहलवान बनेगा तथा चोरों की वस्तुएँ प्राप्त करेगा। बाईं भुजा पर तिल, मुफ्त की सी आमदनी।
शनि की सातवीं उच्च दृष्टि से जातक का अपने शत्रुओं पर विशेष प्रभाव बना रहता है। वह उन पर विजय हासिल कर लेता है। ग्रह स्थितिवश भाग्य की वृद्धि कम ही होती है। समाज में सम्मान न के बराबर मिता है।
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