Wed. Feb 4th, 2026
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जनतानामा न्यूज़ अल्मोड़ा उत्तराखण्ड़

देहरादून/नैनीताल उत्तराखण्ड में यदि कोई पूछे कि कानून चलता है या अफसर, तो जवाब अब दस्तावेज़ों में दर्ज हो चुका है।
कृषि निदेशालय ने उत्तराखण्ड लोक सेवकों के स्थानांतरण अधिनियम, 2018 को खुलेआम रौंदते हुए ऐसा खेल खेला, जो सीधे-सीधे संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देता है।
यह कोई आरोप नहीं —
यह RTI से निकला प्रशासनिक सच है।
 6 महीने तक फाइल कैद — किसके इशारे पर?
RTI एवं सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर जोशी (पूर्व कृषि अधिकारी) द्वारा प्राप्त रिकॉर्ड बताते हैं कि:
▪ अधिनियम लागू होने के बावजूद
▪ 6 माह तक फाइल जानबूझकर दबाकर रखी गई
▪ न अनुशासनात्मक कार्यवाही
▪ न जवाबदेही तय
▪ न धारा-22, 23(12), 24 का पालन
यानि कानून बना, लेकिन लागू नहीं होने दिया गया।



23 स्थानांतरण, 11 गैरकानूनी कार्यग्रहण — फिर भी सब सुरक्षित
RTI दस्तावेज़ों के अनुसार:
 वर्ष 2025 में 23 श्रेणी-2 अधिकारियों के अनिवार्य स्थानांतरण
 सिर्फ 12 अफसरों ने 10 दिन की कानूनी समय सीमा मानी
 11 अधिकारियों ने सीधा कानून तोड़ा
 एक अधिकारी को कागज़ों में कार्यमुक्त दिखाकर क्लीन चिट
 एक अधिकारी आज भी आदेश की प्रतीक्षा में — नियम हवा में
 धारा-24 के तहत दंड = ZERO
अब सवाल यह नहीं कि नियम टूटा —
सवाल यह है कि नियम तोड़ने की इजाज़त किसने दी?
⚖️ धारा-23(12) का कत्ल, धारा-24 को दफनाया
अधिनियम साफ कहता है:
“10 दिन में कार्यभार ग्रहण अनिवार्य, अन्यथा दंडात्मक कार्यवाही।”
लेकिन कृषि निदेशालय ने:
✖ समय सीमा तोड़ने वालों को संरक्षण दिया
✖ कानून को नोट-शीट में बदल दिया
✖ दंड को जानबूझकर गायब कर दिया
यह प्रशासनिक चूक नहीं —
 यह सुनियोजित अवहेलना है।
裡 “विधायिका का अपमान, शासन की साख पर हमला”
RTI आवेदक का आरोप बेहद गंभीर है:
“निदेशालय ने अधिनियम को कानून नहीं, सलाह पत्र समझ लिया।”
मतलब साफ है —
 विधानसभा कुछ भी बनाए
 अफसर वही करेंगे जो उन्हें सूट करे
यह सोच लोकतंत्र के लिए खतरा है।
6 महीने की खामोशी — संरक्षण किसका?
अब जो सवाल उठ रहे हैं, वे सीधे सत्ता से हैं:
▪ फाइल किसने रोकी?
▪ किस अधिकारी को बचाया जा रहा है?
▪ धारा-22, 23(12), 24 लागू क्यों नहीं की गई?
▪ क्या कुछ अफसर कानून से ऊपर हैं?
️ CMO से PMO तक पहुँचा मामला — अब चुप्पी कब तक?
मामला अब पहुँच चुका है:
✔ सचिव कृषि
✔ मुख्य सचिव
✔ राज्यपाल
✔ कृषि मंत्री
✔ मुख्यमंत्री कार्यालय
✔ प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO)
अब यदि कार्रवाई नहीं होती —
तो यह मान लिया जाएगा कि
मौन भी सहमति है।
⚠️ अब अगला कदम क्या?
यह मामला अब जा सकता है:
 उच्च स्तरीय जांच
 जिम्मेदारी तय
⚖️ दंडात्मक कार्रवाई
 या फिर… एक और फाइल दफन
लेकिन सवाल एक ही है —
उत्तराखण्ड में कानून चलेगा या अफसर?