जनतानामा न्यूज़ अल्मोड़ा उत्तराखण्ड
अल्मोड़ा कुमाऊं का पारंपरिक लोकपर्व सातों-आठों आज आठूं पर्व के साथ उल्लास और आस्था के बीच मनाया जाएगा। बिरूड़ पंचमी से शुरू हुए इस पर्व के आठूं के दिन विशेष रूप से गौरा-महेश्वर यानी माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जाती है। घरों में महिलाएं विधि-विधान से पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल की कामना करेंगी। कही कही महिलाएं एक स्थान पर एकत्र होकर भी पूजा करती है।
आठूं पर्व की प्रमुख परंपराओं में गले में डोर-दुबड़ा धारण करना भी शामिल है। दूब की गांठों से तैयार पवित्र डोरी को पूजा-अर्चना के बाद गले में धारण किया जाता है। कुमाऊं में इसे पर्व की महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा माना जाता है।
संतान की सुख-समृद्धि और परिवार के मंगल की कामना
सातों-आठों पर्व को लेकर कुमाऊं में अनेक लोकमान्यताएं और कथाएं प्रचलित हैं। बिरुड़ाष्टमी की कथा में बिणभाट की सात बहुओं और माता पार्वती के आशीर्वाद का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, विधि-विधान से व्रत और गौरा-महेश की पूजा करने वाली बहू को संतान की प्राप्ति हुई। इसी लोकमान्यता के कारण यह पर्व संतान की सुख-समृद्धि, संतान की रक्षा, परिवार के कल्याण और अखंड सौभाग्य की कामना से भी जुड़ा माना जाता है।
क्यों मनाया जाता है आठूं?
सातों-आठों पर्व मूल रूप से गौरा यानी माता पार्वती और महेश यानी भगवान शिव की आराधना से जुड़ा लोकपर्व है। लोकमान्यता के अनुसार सातों के दिन गौरा अपने मायके आती हैं और आठूं के दिन महेश उन्हें लेने पहुंचते हैं। इसी भाव के साथ पति-पत्नी के प्रेम, पारिवारिक सुख, संतान की मंगलकामना और रिश्तों की आत्मीयता को पर्व में विशेष स्थान दिया गया है।
पर्व के दौरान बिरूड़ों की पूजा और उन्हें प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की भी परंपरा है। महिलाएं सामूहिक रूप से लोकगीत गाती हैं और कई स्थानों पर झोड़ा-चांचरी सहित पारंपरिक सांस्कृतिक आयोजन भी होते हैं। इस तरह आठूं पर्व कुमाऊं की आस्था, लोकसंस्कृति और पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।
धार्मिक फल की लोकमान्यता: इस व्रत और पूजा से परिवार में सुख-शांति, संतान की कुशलता, संतान प्राप्ति की कामना तथा पति-पत्नी के सुखी जीवन और दीर्घ मंगल की कामना की जाती है। इसे लोकविश्वास के रूप में समझना चाहिए, धार्मिक आस्था का निश्चित फल बताना नहीं।