जनतानामा न्यूज़ अल्मोड़ा उत्तराखण्ड
आरानीखेत अल्मोड़ा: हिमालय की गोद में बसे रानीखेत से एक ऐसी कहानी उभर रही है, जो शिक्षा की पारंपरिक परिभाषाओं को पीछे छोड़ते हुए भारत की कला, संस्कृति और विरासत के संरक्षण का सशक्त उदाहरण बन चुकी है। द प्लेज़ेंट वैली स्कूल आज केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की जीवंत धरोहर को संजोने और उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने वाला एक प्रतिबद्ध सांस्कृतिक केंद्र बनकर स्थापित हो चुका है।

देवदार के सघन वनों और हिमालय की निर्मल आभा से घिरा यह परिसर मानो स्वयं में एक सांस्कृतिक संसार रचता है, जहाँ शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा परिणाम नहीं, बल्कि जीवन के गहरे मूल्यों का विकास है। यहाँ परंपरा और आधुनिकता के बीच कोई टकराव नहीं, बल्कि एक सुसंगत संवाद दिखाई देता है—एक ऐसा संवाद, जो विद्यार्थियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखते हुए उन्हें भविष्य के लिए तैयार करता है।
विद्यालय की पहचान उसके उस सतत और गंभीर प्रयास से बनती है, जिसके तहत भारतीय संस्कृति को केवल सिखाया नहीं, बल्कि जिया जाता है। नवरात्र के पावन अवसर पर आयोजित होने वाली वार्षिक रामलीला इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। यह आयोजन किसी औपचारिक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक जीवंत शैक्षिक प्रक्रिया का रूप ले लेता है, जहाँ मंच पर घटित हर प्रसंग छात्रों के भीतर नैतिकता, कर्तव्य और सत्य की गहरी समझ विकसित करता है।
यहाँ रामायण को केवल एक कथा नहीं, बल्कि जीवन के मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। राम, सीता, लक्ष्मण और रावण जैसे पात्र छात्रों के लिए अभिनय के किरदार भर नहीं रहते, बल्कि वे जीवन के जटिल प्रश्नों को समझने के माध्यम बन जाते हैं। विद्यार्थी इन पात्रों के माध्यम से यह सीखते हैं कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, सत्य, धर्म और कर्तव्य से समझौता नहीं किया जा सकता।
तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में, जहाँ सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण एक बड़ी चुनौती बन चुका है, वहीं द प्लेज़ेंट वैली स्कूल का यह निरंतर प्रयास एक सशक्त सांस्कृतिक घोषणा के रूप में सामने आता है। यह संस्थान यह स्पष्ट करता है कि भारत की विरासत कोई बीती हुई कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की दिशा तय करने वाली जीवंत शक्ति है।
विद्यालय की विशेषता यह भी है कि यहाँ परंपराओं को बिना प्रश्न किए स्वीकार करने के बजाय, उनके गहरे अर्थों को समझने की प्रेरणा दी जाती है। रामायण के प्रसंगों के माध्यम से छात्र धर्म, नैतिकता और शक्ति के प्रयोग जैसे जटिल विषयों पर विचार करते हैं। इस तरह रामलीला यहाँ केवल सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक गंभीर बौद्धिक प्रक्रिया का रूप ले लेती है।
विद्यार्थियों के लिए यह अनुभव उनके व्यक्तित्व निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाता है। वे केवल दर्शक नहीं रहते, बल्कि परंपरा के सक्रिय सहभागी बनते हैं। इस प्रक्रिया में उनकी भावनात्मक समझ, नैतिक संवेदनशीलता और सांस्कृतिक चेतना का विस्तार होता है।
इसी सांस्कृतिक प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाते हुए 18 और 19 अप्रैल 2026 को विद्यालय में 24 घंटे का “श्री अखंड रामायण पाठ” आयोजित किया गया, जिसका समापन पावन पर्व अक्षय तृतीया के अवसर पर हुआ। विद्यालय के हनुमान मंदिर परिसर में आयोजित इस अनुष्ठान में पारंपरिक विधि-विधान और अनुशासन का पूर्ण पालन किया गया, जिसने वातावरण को भक्ति और आस्था से सराबोर कर दिया।
इस आयोजन की सफलता के पीछे शिक्षकों—सुश्री मोनिका जोशी, सुश्री नीलम शर्मा, श्री अश्विन कुमार, श्री नितिन सिंह बर्तवाल, सुश्री करीना और सुश्री हिमानी अधिकारी—सहित पूरे विद्यालय परिवार का समर्पण स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। श्रद्धालुओं के लिए की गई व्यवस्थाएँ इस बात का प्रमाण थीं कि यहाँ संस्कृति केवल मंच तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के व्यवहार में पूरी तरह समाहित है।
कार्यक्रम में विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों और स्थानीय समुदाय की बड़ी भागीदारी ने यह दर्शाया कि विद्यालय केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि समाज का अभिन्न हिस्सा है। इस अवसर पर भोजपुरी के प्रसिद्ध कवि डॉ. संतोष पटेल और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती रंजू जी की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की।
इसके साथ ही गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के पूर्व निदेशक डॉ. ज्वाला प्रसाद की उपस्थिति ने इस आयोजन को राष्ट्रीय महत्व से जोड़ दिया। उन्हें ऑक्सफोर्ड, लंदन में महात्मा गांधी की 155वीं जयंती पर महात्मा गांधी लीडरशिप अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है।
कार्यक्रम में वर्किंग जर्नलिस्ट्स ऑफ इंडिया, दिल्ली प्रदेश के उपाध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री ईश मलिक विशेष आमंत्रित अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि शिक्षाविद श्री पुनीत यादव विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों की भागीदारी ने आयोजन को व्यापक सामाजिक आयाम दिया। दिल्ली के वरिष्ठ विधायक जितेंद्र महाजन सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने भी अपनी शुभकामनाएँ प्रेषित कीं।
यह आयोजन शिक्षा, आध्यात्मिकता और सामाजिक सहभागिता का एक दुर्लभ संगम बनकर सामने आया। नवरात्र के दौरान आयोजित रामलीला, जो शक्ति और धर्म के समन्वय का प्रतीक है, विद्यालय में सांस्कृतिक चेतना को नई ऊँचाइयों तक ले जाती है।
समग्र रूप से, द प्लेज़ेंट वैली स्कूल आज एक ऐसे सशक्त सांस्कृतिक सेतु के रूप में स्थापित हो चुका है, जो भारत की प्राचीन विरासत को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ते हुए नई पीढ़ी को न केवल ज्ञान, बल्कि पहचान भी दे रहा है।
यह संस्थान एक स्पष्ट और प्रभावशाली संदेश देता है—शिक्षा तब तक पूर्ण नहीं हो सकती, जब तक उसमें संस्कृति का समावेश न हो। भारत की कला, संस्कृति और विरासत के संरक्षण के प्रति इसकी अटूट प्रतिबद्धता न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एक अनुकरणीय आदर्श भी प्रस्तुत करती है।