जनतानामा न्यूज़ अल्मोड़ा उत्तराखण्ड
अल्मोड़ा सहकारी समितियों के चुनाव स्थगित किए जाने के फैसले के बाद अब इसके कारणों और संभावित प्रभावों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। एक ओर प्रदेश में लगातार सामने आ रही आपदा की परिस्थितियों और प्रशासनिक व्यस्तताओं को चुनाव स्थगन की प्रमुख वजह माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सहकारी क्षेत्र से जुड़े राजनीतिक समीकरणों को लेकर भी तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।
सहकारी समितियों के चुनाव ग्रामीण क्षेत्रों में खासा महत्व रखते हैं। इन संस्थाओं से किसानों, दुग्ध उत्पादकों, छोटे कारोबारियों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े लोगों का सीधा जुड़ाव होता है। ऐसे में चुनाव की प्रक्रिया केवल पदों के निर्वाचन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक प्रभाव और संगठनात्मक पकड़ के लिहाज से भी इसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
आपदा बनी चुनाव स्थगन की वजह, लेकिन सवाल भी बरकरार
प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार बारिश, भूस्खलन, सड़क बाधित होने और अन्य आपदा संबंधी परिस्थितियों के बीच प्रशासन के सामने राहत एवं बचाव कार्यों को प्राथमिकता देने की चुनौती है। ऐसे माहौल में चुनाव प्रक्रिया को स्थगित करने का निर्णय प्रशासनिक दृष्टि से उचित बताया जा सकता है।
हालांकि, चुनाव स्थगन के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि नई चुनाव तिथि कब घोषित होगी और क्या तब तक परिस्थितियां पूरी तरह सामान्य हो जाएंगी? चुनाव प्रक्रिया पहले से चल रही हो और दावेदार मैदान में उतर चुके हों, ऐसे में अचानक प्रक्रिया रुकने से चुनावी तैयारियों में जुटे लोगों की रणनीति भी प्रभावित होना स्वाभाविक है।
स्थगन के सियासी मायने तलाश रहे दावेदार
सहकारी संस्थाओं के चुनावों को लेकर स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दलों और उनके समर्थित प्रत्याशियों की सक्रियता भी रहती है। ऐसे में चुनाव स्थगित होने के बाद संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
कई दावेदारों ने चुनाव को लेकर अपनी तैयारियां शुरू कर दी थीं। संपर्क अभियान, बैठकों और समर्थन जुटाने की प्रक्रिया के बीच चुनाव टलने से अब समीकरणों को नए सिरे से साधने का समय मिल गया है। यही कारण है कि राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि चुनाव की नई तारीख आने तक कई पुराने समीकरण बदल सकते हैं और कुछ नए गठजोड़ सामने आ सकते हैं।
परिवारवाद की चर्चा ने भी पकड़ा जोर
चुनाव स्थगन के साथ ही सहकारी क्षेत्र में परिवारवाद और एक ही राजनीतिक परिवार या प्रभावशाली समूह के आसपास पदों के सिमटने को लेकर भी चर्चाएं होने लगी हैं। हालांकि, इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह सवाल जरूर उठाया जा रहा है कि सहकारी संस्थाओं में वास्तविक रूप से आम सदस्यों और किसानों की भागीदारी कितनी प्रभावी है और क्या चुनावी प्रक्रिया में सभी वर्गों को समान अवसर मिल पाता है।
यदि चुनाव दोबारा घोषित होते हैं तो यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पुराने दावेदार ही मैदान में उतरते हैं या नए चेहरे भी अपनी दावेदारी पेश करते हैं। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि राजनीतिक दल और उनके समर्थक सहकारी संस्थाओं के चुनाव में किस तरह की रणनीति अपनाते हैं।
अब नजर नई चुनाव तिथि पर
फिलहाल चुनाव स्थगन के बाद सबसे अधिक नजर नई चुनाव तिथि पर है। प्रशासन के सामने जहां आपदा और व्यवस्थाओं को प्राथमिकता देने की चुनौती है, वहीं चुनाव से जुड़े लोगों में जल्द प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद बनी हुई है।
सहकारी चुनावों की नई तारीख सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि मौजूदा राजनीतिक समीकरण कायम रहते हैं या चुनावी मैदान में नए चेहरे और नए गठजोड़ सामने आते हैं। फिलहाल चुनाव स्थगन ने इतना जरूर कर दिया है कि आपदा के प्रशासनिक कारणों के साथ-साथ सियासी गणित, दावेदारों की रणनीति और परिवारवाद जैसे मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में आ गए हैं।